Helping The others Realize The Advantages Of Chamatkari Totke - यह लिखकर जेब में रख ले किसी मंत्र की जरूरत नहीं "Vashikaran Without +91-9779942279




डॉ. शेरजंग गर्ग की बेहद तराशी हुई बाल कविताओं की जादुई लय ही नहीं, उनकी कविताओं में हास्य और व्यंग्य की मीठी गुदगुदी भी बाल पाठकों को रिझाती है और वे एक बार पढ़ने के बाद, कभी उन्हें भूल नहीं पाते। उनके गीतों में जैसी पूर्णता है, वैसी कम-बहुत कम नजर आती है। इस लिहाज से वे अपनी नजीर खुद हैं और उन थोड़े से बाल कवियों में से हैं जिनका कविता पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते हैं कि यह कविता इन्हीं की है।

इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

What's it prefer to live in this article? With area insight, Roli Jindal can take you past the vacationer guides deep Within the heart of Benaras and demonstrates you how this bustling, crowded city retains its spiritual Main and its one of a kind tradition, while keeping completely in sync with contemporary situations. This is a private, insider view of what lifetime is like On this quite exciting town.

---डॉ० वीरेंद्र शर्मा, भारतीय विदेश सेवा ( अव०), पूर्व राजदूत

इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 

किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 

"पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"

यदि आपके पास धन की कमी हो या धन की समस्या से झूझ रहे हों तो आप कपूर का इस्तेमाल करें।

श्रीनिवास वत्स की ऐसी ही दर्जनों कहानियों को इस पुस्तक से संगृहीत किया गया है । बच्चे तो बच्चे बड़े भी इन्हें पूरा पढ़े  बिना नहीं रह सकेंगे । अनूठे अंदाज, अनूठे ताने-बाने से रची ये रचनाएँ मनोरंजन का खजाना हैं । पढ़कर देखिए तो सही ।

किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।

अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।

हांफता हुआ शोर नेसार नाज़ की बेहद पठनीय कहानियों का संग्रह है। आज के दौर में जब कहानी से कहानीपन गायब होता जा रहा है तब नेसार नाज़ की कहानियां पढ़ना अलग प्रकार का अनुभव देता है। नेसार की कहानी कला इतनी पुरकशिश है कि पाठक या श्रोता कहानी के पहले वाक्य से कथाकार के साथ जुड़ जाता है। नेसार नाज़ समाज की मूल इकाई लोग यानी मनुष्य और उसकी फितरत के साथ तारतम्य बिठाकर अद्भुत किस्सागो की तरह कहानी सुनाने लगते हैं। उनकी चिंताएं हमें मुंशी प्रेमचंद के समय से जोड़ती हैं। तब भी इनसानी बिरादरी के बीच असमानता, विद्वेष, Chamatkari Totke "Vashikaran Without घृणा और अपमान से बचाने की मुहिम थी और आज भी ये हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। नाज़ की लड़ाई इनसानियत को बचाए रखने की लड़ाई है और उनके सामाजिक सरोकार सिर्फ इनसान की बेहतरी के लिए हैं। 

अव्यवस्थित और मनुष्य-विरोधी व्यवस्था पर कहानियों के जरिए कमेंट करना देवेन्द्र चौबे के कथाकार को अच्छा लगता है । अपनी पहली कहानी से ही जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था लिए यह कथाकार जब 'सजा' जैसी बड़ी कहानी पर पहुंचता है तो यह संकेत भी दे जाता है कि यथार्थ को पकड़ने के लिए दूरी भी कभी-कभी सहायक साबित होती है । सोवियत संघ के विघटन के बहाने लिखी गई यह कहानी गौरतलब तो है ही, गंभीर बहस भी आमंत्रित करती है ।

जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।

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